हम कह्ते है की हमे कोई फर्क नहीं पडता ..फिर भितर ही भितर हम क्यों चाहते है की कोई हमारी फनकारी को देखे??
माफ किजीएगा..हम चाहते है...यकीनन चाह्ते है!
चाहे वह नृत्य हो,नाट्य हो, लेख हो,कोई भी फन..
जैसे हम लेखक या कवि चाहते है की कोई हमे पढे..और पढे तो हमने जो लिखा है उसे समजे?? शब्द के भितर को समजे... शायद समज पाए तो हमझबा बने..हमसे कहे...
हम शुरु जरुर करते है स्वयं की खुशी के लिये..पर मन ही मन सभी यही चाह्ते है..
हमे फर्क जरुर पडता है...चाहे कुछ क्षण के लिये ही क्यों नहीं..
पर हमे फर्क जरुर पडता है..
मैं तो भई रमता जोगी, जोग लगाए जात हूँ
इंसान चाहे महलों में रहे या कुटियां मैं...इच्छा,हां इच्छा उसे छु ही लेती है..कोई इच्छा ना होने की भी तो इच्छा ही होती है ना??
माफ किजीएगा..हम चाहते है...यकीनन चाह्ते है!
चाहे वह नृत्य हो,नाट्य हो, लेख हो,कोई भी फन..
जैसे हम लेखक या कवि चाहते है की कोई हमे पढे..और पढे तो हमने जो लिखा है उसे समजे?? शब्द के भितर को समजे... शायद समज पाए तो हमझबा बने..हमसे कहे...
हम शुरु जरुर करते है स्वयं की खुशी के लिये..पर मन ही मन सभी यही चाह्ते है..
हमे फर्क जरुर पडता है...चाहे कुछ क्षण के लिये ही क्यों नहीं..
पर हमे फर्क जरुर पडता है..
मैं तो भई रमता जोगी, जोग लगाए जात हूँ
फिर किसके खातिर भला मैं चिम्टा बजाए जात हूँ??
पा लिया, खुद को और खुदा को जब अपने ही भितर
अब किसके दरसन की आस में दर दर भटकत जात हूँ??
मैं तो भई रमता जोगी, जोग लगाए जात हूँ
भगवे पहने, भभूति लगाई और दिये झोला टंगाए
भेष ये जोगी वाला अब किसको दिखाने जात हूँ??
मस्त हुआ मैं,हुआ मलंग मैं..अपनी ही फकिरि में
मौन में जब रखा सब, फिर क्यों शब्द गवाए जात हूँ
मैं तो भई रमता जोगी, जोग लगाए जात हूँ
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