रातभर खयालों की कश्मकश के बाद अभी अभी उसकी आँख लगी थी। अलारम की कर्कश आवाज ने उसको फिर जगा दिया। आज कॉलेज नहीं जाना था। पर उठ्ना तो पडेगा ही, उसने सोचा ! कल ही डॉक्टर आन्टी माँ को देखकर गयी थी। उन्हों ने पापा से कहे कुछ शब्द उसके कान भी पड़े थे। "ज्यादा से ज्यादा १-२ दिन, आप किसीको बुलाना चाहे तो बुला लीजिये।" सत्रह साल की उम्र में वह इस बात का शाब्दिक अर्थ समजने के काबिल तो थी। पर उन की गहराइयो को नहीं। वह उठ कर घर के काम में लग गयी। माँ को देखने के लिए रिश्तेदार का आना और व्यर्थ की चिंता बढ़ाना तो अब आम बात हो गयी थी। सब को अपने अपने काम पर जाने की फ़िक्र थी। पर फिर माँ की तबियत और अस्वस्थ लगने लगी। व्यवहारिक विचार विमर्श के बाद सब अपने अपने काम में लग गए।
उसने जल्दी जल्दी में कुकर लगाया। रसोई के काम उसको कहाँ आते थे! अभी अभी तो कॉलेज में दाखिला हुआ था।
हर लड़की की उम्र में एक समय आता है जब वह अपनी माँ से सांसारिक और घरेलु काम सीखती है। पर समय ने उसके जीवन में वो समय ही नहीं लिखा था!
वह स्कूल से निकले उसके पहले ही माँ की जानलेवा बीमारी का निदान हो गया था। पुरे २ साल लगे थे उसे इस बात की गंभीरता तो समजने में। पर अब बहोत देर हो चुकी थी। डॉक्टर भी जवाब दे चुके थे।
उससे माँ की तकलीफ देखी भी नहीं जाती थी। वह सिर्फ इतना चाहती थी की बस बिना किसी तकलीफ के उनके प्राण निकले। उसे क्या पता की माँ के प्राण निकलने पे एक बेटी का क्या हाल होता है!!
समय जब तक हमें समज देता है....तब तक एक पूरा जीवन बीत जाता है।
माँ को भी शायद अंत का अंदाजा लग गया था। उसने नानी से कहा "मुझे स्नान करा दो।"...."माँ नहीं सुधेरेगी !" उसने मन ही मन सोचा! उसकी माँ एक बहुत ही शुद्धात्मा थी। प्रभु भक्ति, संयमित जीवन , सुशिक्षित पर नम्र!! ऐसे इंसान भगवान भी कभी कभी ही बनाते है।
नानी ने और उसने माँ के हाड को स्नान करके पलंग पे लेटाया। वह फिर रसोई में लग गयी. एक बजने वाला था , नानी ने कहा "सब लोग खाना खा लो मुझे भूख नहीं।"
एक तरफ एक बेटी और एक तरफ एक माँ, दोनों ही जानते थे के एक माँ और एक बेटी का आखरी वक़्त चल रहा है. सिर्फ समय की गंभीरता को समजने की शक्ति अलग अलग थी।
भूख और प्यास प्राणी की एक ऐसी जरुरत है, जो उसके आपे से बाहर है...वरना स्मशान से आये हुए बन्दे जो अभी अभी जीवन की वास्तविकता के साक्षी बने है...एक लाश जो कभी इंसान थी...उसको अपने हाथो से जलाने के पश्चात ..लौटकर सबसे पहले चाय-पानी को न्याय देते है।
एकआध निवाला मुंह में डाला ही था की ताईजी ने इशारे से पापा को बुलाया। सब ने थाली वही छोड़ दी। "बेटा दिया जलाओ और मम्मी के सर के पास बैठकर गीता पढो", नानी ने आदेश दिया।
वह माँ के पास जा कर बेठी और पढने की कोशिश करने लगी। उसकी नज़र माँ के चेहरे से नहीं हट रही थी. आँखे आधी खुली थी, और चेहरे पे कुछ अस्वस्थता थी। पापा सामने बैठकर लाचारी से सब देख रहे थे। नानी ने माँ के कान में कहा " तुम निश्चिन्त हो कर जाओ , वह अभी आता ही होगा। तुम अपने प्राण मत अटकाओ" ! भाई की बात हो रही थी। वह अभी हॉस्टल से आया नहीं था. माँ के प्राण उसमे अटके थे..शरीर ने तो कब का साथ छोड़ दिया था। पर फिर आत्मा भी संभल गयी।
एक पल में उसके सामने, माँ ने पूरी आँखे खोली, और खुली ही रह गयी! प्राण निकल गए, और सब कुछ एकदम शांत हो गया। उसके जीवन को अशांत करने वाली वह शान्ति थी।
आज बीस साल के बाद, जब वह खुद एक माँ थी उसको माँ की कमी बहुत ज्यादा महसूस हो रही थी। आज फिर वही तारीख थी। हर साल मानो वह इस दिन को फिर से जीती थी. जो आंसू तब न निकल पाए वो अब हर साल पल पल उसको याद करते बहते थे !!
सच ही है, एक माँ के अंत के साथ ही एक बेटी की भी मृत्यु हो जाती है, और बचती है एक नि:सहाय औरत!
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