क्षितिज
धरती की विशालता का अमर अंत है क्षितिज,
पर क्षितिज के उस पार भी तो एक और धरा है!
क्षितिज की विस्तृतता का सिर्फ अंदाजा लगा पाएंगे
के उस पार भी विस्मयता का खझाना गडा है!
हाथो में कभी न सिमट पाओगे इस चमत्कार को
इसके पाने को बन्द आंखो की कल्पना ही काफि है!
उँचे पर्वत, अथाग सागर, पार कर पाओगे
पर ए मनुष्य क्या तुम क्षितिज को सर कर पाओगे??
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